आज जब मुझे कोई ठीक जॉब नहीं मिल पा रही है तो मुझे एहसास हो रहा है कि इसका एकमात्र कारण है skillless होना. किसी भी skill में दक्ष नहीं होना. न पढ़ाई में. न सिलाई में. न लिखाई में. न कम्प्यूटर में. न कंटेंट क्रिएशन में. न ही किसी अन्य एक भी स्किल में. मैं हर एक चीज में औसत ठहरता हूँ. इसलिए मन मुताबिक काम नहीं पा पा रहा हूँ.
मेरे पास कोई लक्ष्य नहीं. मैं लक्ष्यहीन हूँ. इसका एकमात्र कारण है मेरा स्कूल. जहाँ मेरी पढ़ाई-लिखाई हुई. मेरी बारहवीं तक की पढ़ाई उस स्कूल में हुई, जहाँ बार स्नातक पास युवा गैर मान्यता प्राप्त स्कूल खोलकर गाँव-गाँव, घर-घर जाकर चच्चा-चाचा, चच्ची-चाची, अम्मा-आजी, दादा-बाबा आदि कह-कहकर उनके बच्चे का एडमिशन अपने स्कूल में करवाते हैं. एकदम सस्ती फीस होती है उनके प्राइवेट स्कूलों की. जिसे वसूलने के लिए वह तरह-तरह के हथकंडे वह अपनाते हैं फिर भी कभी भी सही से सबकी पूरी की पूरी फीस वसूल नहीं पाते हैं. एडमिशन उनका वह पहले किसी दूसरे स्कूल से टाई अप करके वहां करवा देते हैं. पाँच-दस साल में खुद भी पाँचवी या आठवीं तक मान्यता ले लेते हैं, सोर्स-सिफारिश से. बाकी उनका विद्यालय 12वीं तक चलता रहता है. छप्परों में, टीनों में या एक दो छत वाले कमरों में. बिज़नेस भी फलता-फूलता रहता हैं. चाहे बोर्ड फीस पर चेतावनी देना हो या प्रैक्टिकल में फुल नंबर के लिए फीस जमा करवाना हो. या फिर स्कॉलरशिप फॉर्म सबमिट करवाने के लिए खर्चा पानी लेना हो. फिर स्कॉलरशिप फॉर्म डस्टबिन में डाल कर रुपये अपनी जेब में डालना हो. स्कॉलरशिप गयी भाड़ में. आए चाहे भाड़ में जाये. चार-पाँच साल की बक़ाया फीस लेने के लिए एडमिट कार्ड और मार्कशीट लटकवा देना हो. अगर 11वीं में मैथ्स के बच्चे कम हो तो उन्हें बायो लेने पर मज़बूर कर देना हो. ऐसी व्यवस्था में बच्चा क्या खाक पढ़ पायेगा. हाँ इन 12-13 साल में साक्षर जरूर हो जायेगा. लक्ष्य सभी नहीं बना पाते. आगे की दुनिया कैसी होती है पढ़ाई कि इससे भी नवाक़िफ़ ही रहते हैं अधिकांशतया.
इस व्यवस्था से निकला हुआ इंसान हूँ मैं. जिसके घर पर पढ़ने का रत्ती भर भी माहौल नहीं था. कोई डॉयरेक्शन देने वाला नहीं मिला. आर्थिक मार से तंग परिवार से निकल कर किसी यूनिवर्सिटी के मेन कैंपस से BA किया. मजाक बन कर रह गया.
अब जॉब ढूंढ रहा है. काम ढूंढ रहा है. साथ में पढ़ाई करना चाहता है. पर उसे जॉब मिल नहीं पा रही. या जो मिल रही वह करना नहीं चाह रहा.
क्या उसे भी गाँव जाकर उसी व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहिए? वह यही सोच रहा है.