फेसबुक पर आदरणीय आरएसडी चातक जी की पोस्ट "यह मेरी मूर्खता है या आशंका कि ऐसे ही अन्य भाषाओं का मिश्रण एक दिन हमारी मातृभाषा हिन्दी के मूल अस्तित्व को निगल जायेगा ?" के रिप्लाई में मैंने त्रिभाषा फॉर्मूला नियम पर ये कुछ लिखा. प्रस्तुत है पढ़ा जाए.
यही वर्तमान का यथार्थ सत्य है कि इंद्रप्रस्थ वाली भाषा हमारे अवध की भाषा का अधिग्रहण कर चुकी है और निरंतर तत्परता से कर रही है.
आज हमारी मातृ भाषा को जाहिलों की भाषा या अनपढ़ों की भाषा का अलंकार प्राप्त है. अगर हम ऐसे ही अपनी भाषा से घृणा करते रहे और अपनी मातृ भाषा में लिखना पढ़ना चालू नहीं किया तो वह सिर्फ शोधकों के योग्य रह जाएगी.
सरकार को हमारी मातृभाषा में शिक्षा पर भी प्रोत्साहन देना चाहिए. नई शिक्षा नीति 2020 में त्रिभाषा फॉर्मूला तो है पर हमारे प्रदेश में नहीं, लगता भी नहीं है कि त्रिभाषा फॉर्मूला लागू किया भी जायेगा. हमारे प्रदेश में तो सिर्फ वही इंद्रप्रस्थ की भाषा को थोप दिया गया है और यह मान लिया गया है कि वह ही हमारी मातृभाषा है. पर हमारा तो द्विभाषा के पाठ्यक्रम से ही काम चल जा रहा है. इसका मतलब है कि हमें त्रिभाषा फॉर्मूले की जरूरत नहीं है. और अगर सर्वे सर्वा सरकार सच में त्रिभाषा फॉर्मूला पूरे देश में लागू करना चाहती है तो उसे यहाँ पर भी हमारी मातृभाषा या अगर सच में इंद्रप्रस्थ की भाषा से ही उसे कवर करना है तो मेरठ व उसके आसपास जन्मी उस नास्तलिक लिपीय भाषा को त्रिभाषा फॉर्मूले के अंतर्गत शामिल करके उसकी शिक्षा प्रदान करनी चाहिए जिसे प्रदेश की तथाकथित दूसरी अधिकारिक भाषा का दर्ज़ा प्राप्त है. किसी भी भाषा को प्रदेश में समुदाय विशेष की संख्या के आधार पर अधिकारिक भाषा का दर्ज़ा देना बिल्कुल गलत है और उसके बाद उस भाषा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के बजाय उसे उसी समुदाय विशेष की बपौती बना देना उससे भी गलत. इस तरह से किसी भाषा की कोई उन्नति नहीं होती और अगर ऐसा ही रहा तो वह भी प्रदेश के इतिहास के शोधपत्रों में समा जाएगी. यथार्थ रूप में नहीं रह पायेगी.
त्रिभाषा फॉर्मूला सिर्फ इसीलिए लाया गया है कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, पंजाब आदि और कुछ पूर्वोत्तर के राज्य भी जो केवल अपनी मातृ भाषा और आंग्ल भाषा में शिक्षा ग्रहण करते हैं, को भी इंद्रप्रस्थीय भाषा पढ़ने को बाध्य करना. त्रिभाषा फॉर्मूला भारत को एक राष्ट्रीय भाषा प्रदान करने की दिशा में एक मजबूत आधारभूत नियम है. जिससे भविष्य में इंद्रप्रस्थीय भाषा को पूरे भारत की भाषा बनाया जा सके. पर इससे पूरे भारत को एक भाषा तो मिल जाएगी. पूरे भारत के लोग एक रंग में रंग जाएंगे. पर अभी जो भारत की विविधता है. जो भारत अनेक रंगों में रंगा हुआ है. उसका एक रंग में रंगना उसकी विशिष्ठता को धूमिल कर देगा. क्योंकि उसकी अद्वितीय क्षेत्रीयता को इससे खतरा पैदा हो जायेगा. अपने समय के बहुत बड़े विद्वान और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा दर्शाई गई यह उक्ति असत्य हो जाएंगी कि "कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी".
यह त्रिभाषा फॉर्मूला भारत के भविष्य की राजनीतिक परिदृश्य भी बदल कर रख देगा. भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों की एक बड़ी ताकत है उनकी क्षेत्रीय भाषाएँ. इस नियम से उनका भविष्य भी अंधकार के गहरे गर्त में अंधा पड़ जायेगा. और भारत में एक पार्टी आसानी से राज कर पायेगी. किसी के लिए भी राजनीतिक प्रोपेगैंडा फैलाना आसान हो जायेगा.
यह भी ध्यान देने की बात है सर्वे सर्वा सरकार एक तरफ उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में द्विभाषा पाठ्यक्रम ही बने देने रह रही है. वहीं तमिलनाडु जैसे राज्य जहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही भाषा थोपने के विरोध का इतिहास रहा है वहाँ इसे एक राजनीतिक पार्टी का विरोध बता रही है, जो कि पूरी तरह से सर्वे सर्वा सरकार का दोगलापन है. और उसकी स्वयं के राजनीतिक लाभ की मंशा की पोल खोलता है.
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