28-29 जनवरी मध्यरात्रि के आसपास लगभग 2 बजे महाकुम्भ मेले में मौनी अमावस्या स्नान के लिए संगम के तट पर पहुंची भीड़ में भगदड़ मच गयी। जिसमें लगभग 30 लोगों की मौत हो गयी और सैंकड़ों घायल हो गये। गंभीर घायलों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। यह घटना चारों ओर सनसनी बनकर फैल गयी। जो कोई सुनता दंग रह जाता। आखिर भगदड़ क्यों मची? इसके क्या कारण थे? इस घटना का शिकार हुए लोगों का क्या कसूर? आखिर स्थिति प्रशासन के हाथ से बाहर क्यों निकल गयी?
इलाहाबाद या प्रयागराज हिंदू धर्म के लोगों का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थान है। यह मान्यता है कि तीन नदियों गंगा, यमुना व अदृश्य सरस्वती के मुहाने यहीं पर आकर त्रिवेणी संगम बनाते हैं। इसी पवित्र संगम में अधिकांश हिन्दुओं को आज नहीं तो कल मृत्यु को प्राप्त होने पर दाह संस्कार के पश्चात् शेषवत् राख के रूप में विसर्जित होना है। यही आपको यह याद दिलाने को काफी होगा, कि एक हिंदू मानुष के लिए जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा इलाहाबाद या प्रयागराज की होती है।
इसी प्रयागराज में 12 वर्ष के अंतराल पर हर बार कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। जबकी यह अंतराल 6 वर्ष पूर्ण होने पर अर्धकुम्भ का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक 12 कुम्भों के बाद महाकुम्भ आता है। इस प्रकार दो महाकुम्भों के बीच में 144 वर्षों का अंतराल होता है। 2025 में भी 144 वर्षों के बाद वह घड़ी आयी है जब यहाँ महाकुम्भ लग रहा है। इसका प्रत्येक हिंदू के लिए क्या महत्व है? अब आप इस बात पर गहराई से विचार कर सकते हैं।
28-29 जनवरी की रात में जो कुछ भी घटित हुआ उसका वर्णन इस प्रकार है, चूँकि 29 जनवरी को मौनी अमावस्या का पवित्र स्नान था, इसीलिए लोग 28 जनवरी की शाम से ही संगम के तट पर जमा होने लगे कि वे सुबह पहली घड़ी में स्नान करेंगे। परन्तु तट के मुहाने पर लोग सोने लगे जिससे प्रशासन को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी, और देखते-देखते लोगों की संख्या कई करोड़ों में हो गयी। आला-अधिकारी माइक से चिल्ला-चिल्लाकर सोये हुए लोगों को जगाने का प्रयास कर रहे थे। वे "जो सोवत है, ऊ खोवत है" जैसी स्थनीय लोक भाषा का भी प्रयोग कर रहे थे, मगर सोने वालों ने जगने का नाम ना लिया और वही लेटे सोते रहे। उधर भीड़ बढ़ती ही जा रही थी, कुछ देर बाद लोगों ने बैरिकेडिंग भी तोड़ दी। जिससे स्थिति और भी भयावह हो गयी और भगदड़ मच गयी। इस भगदड़ में श्रद्धालुओं के अलावा उनकी रक्षा में तैनात पुलिसकर्मी भी शहीद और घायल हो गये। इस घटना के बाद पूरा प्रशासन महकमा हरकत में आया और अलग-अलग रूटों से घायलों को अस्पताल ले जाया गया।
इस खबर को सुनकर बहुत से श्रद्धालुओं ने मेला आने का अपना कार्यक्रम टाल दिया। लोगों की सुविधाओं और ठहरने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसे सरकारी संस्थानों के गेटों को भी खोल दिया गया। इन चिंताओं में लोगों ने सहयोग का अधिकाधिक हाथ बढ़ाया। श्रद्धालुओं के लिए कई स्थानों पर मस्जिदों के दरवाज़े भी खुल गये। वहाँ उनके रहने व ठहरने के लिए गद्दे और कम्बल की व्यवस्था भी हुई।
इस खबर को लेकर नेताओं ने तरह-तरह के बयान भी जारी किये। अफवाहे भी बहुत फैली। लोगों की चर्चाओं में इस खबर को लेकर फेक न्यूज की बू भी आयी। जिसमें "मुसलमान रुद्राक्षमाला पहिने बैठे रहे" और "कहत हैं मुसलमान सब पत्थर चलाय दिहिन रहय" आदि वाक्य भी सुनाई पड़ें। जिससे लगा कि एक प्रकार की मीडिया ने यहाँ भी अपना काम कर दिखाया।
