Oct 30, 2025

महसी विधानसभा सीट पर बीजेपी के टिकट वितरण में सुरेश्वर सिंह का जलवा

 महसी विधानसभा सीट पर बीजेपी के टिकट वितरण में सुरेश्वर सिंह का जलवा


1962 के चुनाव में महसी विधानसभा सीट आरक्षित (एससी) थी. 1962 के चुनाव में स्वतंत्र पार्टी के राम अवध कनौजिया ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजकिशोर राव को हराया. देश में 1961 की जनगणना के आधार पर 1963 से 1966 के बीच दूसरा परिसीमन हुआ. जिसमें महसी सीट अनारक्षित हो गयी. महसी सीट अनारक्षित क्या हुई, इस पर भारतीय जनसंघ ने नजरें गड़ा ली. दूसरे परिसीमन में अनारक्षित घोषित होने के बाद 1967 के चुनाव में महसी सीट पर भारतीय जनसंघ के गया प्रसाद ने स्वतंत्र पार्टी के महेन्द्र सिंह को पटखनी दी. पर 1969 के चुनाव में भारतीय जनसंघ प्रत्याशी गया प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राम हरख से 147 वोटों से हार गये.


1974 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने वर्तमान (2025) महसी विधायक सुरेश्वर सिंह के पिता सुखदराज सिंह को मौका दिया. दिलचस्प मुक़ाबले में सुखदराज सिंह ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राम हर्ष मिश्रा को मात्र 33 वोटों के मामूली अंतर से पटखनी दी और पहली बार विधायक बने. आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो जाने के उपरांत सुखदराज सिंह को जनता पार्टी से इसी सीट पर टिकट मिला. जिसमें इन्होने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सतीश कुमार सिंह को हराकर लगातार दूसरी बार विधायकी हासिल की.


1980, 1985 व 1989 के चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्याशी इंद्र कुमार सिंह उर्फ़ लल्लू विधायक बने. जिसमें दूसरे स्थान 1980 में बीजेपी प्रत्याशी कन्हैया लाल वर्मा, जबकि 1985 व 1989 में राम हर्ष मिश्रा (क्रमशः निर्दलीय व जनता दल के प्रत्याशी के रूप में) रहे. 1985 व 1989 में बीजेपी प्रत्याशी क्रमशः कन्हैया लाल वर्मा व श्रीनाथ थे.


1991 के चुनाव में बीजेपी ने वर्तमान (2025) महसी विधायक की माता नीलम सिंह को टिकट दिया. जिसमें उन्होंने जनता पार्टी के प्रत्याशी दिलीप कुमार वर्मा को बहुत तगडी पटखनी दी. इसके बाद 1993 व 1996 के चुनाव में सपा के टिकट पर दिलीप कुमार वर्मा ने बाज़ी मारी. दोनो चुनावों में बीजेपी ने नीलम सिंह को टिकट दिया. जहाँ उन्हे रनर-अप रहकर संतोष करना पड़ा.


2002 के चुनाव में बसपा प्रत्याशी अली बहादुर ने सपा प्रत्याशी दिलीप कुमार वर्मा को चित किया. इस चुनाव में बीजेपी ने मधु पांडे को टिकट दिया था. इसके बाद नवम्बर 2003 में महसी सीट पर विधानसभा के उपचुनाव होते हैं. जिसमें सपा प्रत्याशी दिलीप कुमार वर्मा बाज़ी मार लेते हैं और बसपा प्रत्याशी जमीला खातून को हरा देते हैं. इस चुनाव में ही बीजेपी ने सर्वप्रथम वर्तमान (2025) विधायक सुरेश्वर सिंह को टिकट दिया था. पर तब उन्हे तीसरे नंबर पर रह कर संतोष करना पड़ा था.


2007 के चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार के रूप में सुरेश्वर सिंह ने महसी सीट पर बसपा प्रत्याशी अली अकबर को हराकर जीत हासिल की और पहली बार विधायक बने.


2012 का चुनाव अब तक का महसी सीट पर सबसे दिलचस्प मुक़ाबला रहा था. जो कि चतुष्कोणीय हो गया था. 2012 में बसपा प्रत्याशी कृष्ण कुमार ओझा ने इस पर जीत दर्ज़ की. बीजेपी प्रत्याशी सुरेश्वर सिंह रनर अप रहे. सपा प्रत्याशी राजेश तिवारी तीसरे व पूरे दमखम के साथ कांग्रेस प्रत्याशी देवेश चंद्र मजनू चौथे स्थान पर.


2017 व 2022 में सुरेश्वर सिंह विधायक बने. 2017 में कांग्रेस से अली अकबर दूसरे व बसपा से कृष्ण कुमार ओझा तीसरे स्थान पर रहे. 2022 में सपा से कृष्ण कुमार ओझा दूसरे स्थान पर रहे. बसपा से दिनेश कुमार शुक्ला व सपा से बगावत कर राजेश तिवारी कांग्रेस से लड़े.


नोट: बीच-बीच में हुए परिसीमन से महसी विधानसभा सीट का नक़शा बदलता रहा है.


यहाँ एक बात ध्यान में आती है कि महसी सीट पर सभी दलों के प्रत्याशी बदल जा रहे हैं पर बीजेपी व संघ से जुड़ी पार्टी से पहले पिता ने दो बार टिकट हासिल किया. तीन बार माँ ने टिकट पाया. लगातार पांच बार से स्वयं पा रहे हैं. आगे अभी दो से तीन बार तो खुद को मिलेगा ही. फिर बेटे को मिलेगा.


यह बात बहुत ज्यादा जटिल है न?

"परिवारवाद, परिवारवाद, परिवारवाद" का आरोप मढ़ना आसान है न, और स्वयं की पार्टी में परिवारवाद ढूंढ़ना जटिल है न?

ब्राह्मण बाहुल्य महसी के बड़े-बड़े ब्राह्मण नेता जो चुनाव लड़ते हैं, हर पार्टी में दिख जाएंगे पर बीजेपी से इस सीट पर टिकट पाने की आस लगाना जटिल है न?


जटिल क्यों न हो,

जलवा क़ायम है जो न.