क्या होता है? जब पर्व तो होता है पर उस पर्व पर उसका पकवान नहीं बनाया जाता है. आप बच्चों से कुछ ज्यादा जरूरी चीज छीन रहे हो. जिसकी समझ उन्हें तो नहीं, पर आप को जरूर होनी चाहिए. और जब समझ होते हुए भी आप नासमझी वाला बर्ताव करोगे, तो ध्यान रहे आप खुद ही बड़ी गलती कर रहे हो. बताओ साल में एक बार ही तो त्योहार आता है, उस पर बढ़िया पकवान बनता, तो बच्चे उसे दिलचस्पी के साथ बनते देखते, फिर उसे खाते. एक प्रकार की यादें बनाते, अपने बचपन जीते. फिर अगले साल उनको बेसब्री से इंतज़ार रहता इस पर्व के आने का. यह बचपन की एक बहुत खूबसूरत याद बन सकती थी, पर आपने मानो उनकी यादों के साथ ही उनके बचपन का संस्कार भी छीन लिया. वे अभी अंजान है. आप से लड़-झगड़ नहीं सकते. पर क्या आपकी ये जिम्मेवारी नहीं बनती, कि आप उन्हें एक संस्कार्युक्त यादगार बचपन दें.
वैसे आपको तनिक भी अच्छा नहीं लगता है, जब वे मोबाइल पर उंगलियाँ सरका रहे होते हैं. आप उन्हें ऐसा करते देखकर खीझ उठते हैं. पर आप ये क्यों नहीं समझते कि उनके लिए ये पर्व कितना महत्व रखते हैं. आप आज इनसे ये अमूल्य अनुभव क्यों छीन रहे हैं. पकवान ही तो त्योहार की असली जान होते हैं. बाकी जुलूस का तो नया-नया चलन अभी एक-दो दशकों से ही शुरु हुआ है गाँवों में.
बचपन में अपनी मां के हाथों हर पर्व पर तरह-तरह के पकवान बनते देखना कितना सुखदायक अनुभव होता है. कितनी प्यारी याद है वह. भले तब वो मिट्टी के घर में थी, मिट्टी के चूल्हे पर पकाती थी, हाथों से बढ़ाई गई आटे की लोई को एक समतल पेंदी की स्टील की प्लेट को उलट कर, उस पर धारदार गिलास से काट-काट कर गोल-गोल मीठी टिकिया बनाती थी. क्या मजा आता था उसे देखने में. कितनी स्वादिष्ठ होती थी वो मीठी टिक्की और खीर. साल में एक ही बार बनाती थी अम्मा. इसीलिए तो अब भी मुझे उसका इंतज़ार रहता है, पूरे साल. कुंडा, बाईसवीं, 22 रज्जब के पर्व का.
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